Tuesday, October 7, 2008

दोहरी नीति

मदन कश्यप
दिल्ली से प्रकाशित पत्रिका सीनियर इंडिया’ के संपादक अलोक तोमर के विरुद्ध जिस तरह से कार्रवाई की गई, उससे भारतीय जनतंत्र का वह चेहरा फिर से सामने आ गया है, जिसे हम पिछले कोई दो दशक से भुला बैठे थे। स्वर्गीय इंदिरा गांधी के अवसान के बाद जिस तरह की सरकारें आईं और चलीं, उनसे ऐसा लगने लगा था अब हमारे देश में लोकतंत्र की जड़ें इतनी मजबूत हो गई हैं कि शासक वर्ग वैचारिक प्रतिकारों और प्रतिवादों से जनतांत्रिक तरीके से निबट सकता है।परंतु अब एक संपादक को गिरफ्तार करके न्यायिक हिरासत में भेजा गया और लोगों से उनके मिलने तक पर प्रतिबंध लगाया गया। हाल ही में लखनऊ में सीएनएनआईबीएन न्यूज चैनल के एक कैमरामैन पर इसलिए हमला किया गया क्योंकि उसने बसपा प्रमुख मायावती की बेहिसाब सम्पतियों का सच दिखाया था। जाहिर हो गया है कि सत्ता के चरित्र में कोई बदलाव नहीं आया है और उदारीकरण केवल अर्थव्यवस्था का हुआ है, न कि शासन-व्यवस्था का। ’सीनियर इंडिया’ ने पैगंबर मोहम्मद साहब के उस चित्र को छाप दिया था, जिसको लेकर पूरी इस्लामी दुनिया में पहले से ही बवाला मचा हुआ है और किसी प्रकार की सहभागिता नहीं होने के बावजूद भारतीय दूतावासों पर भी हमले हुए हैं। विडम्बना यह है कि कई देशों के शासक खुले तौर पर कट्‌टरपंथियों की मुहिम को हवा दे रहे हैं। इनमें उत्तर प्रदेश सरकार के एक मंत्री भी शामिल हैं। ऐसे में भारत सरकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर कोई खतरा माेल नहीं लेना चाहती है। पर इसके लिए तो पत्रिका के सम्बद्ध अंक की सभी प्रतियों को जब्त कर लिया जाना ही काफी था। संपादक को गिरफ्तार करने का क्या औचित्य था? फिर जैसा कि पता चला कि उनके साथ्ा कुछ ऐसा क्रूर व्यवहार किया गया मानो वह खूंखार आतंकवादी हों।सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सारे महान पक्षकार इस समय चुप हैं। जिन कुछ लोगों ने गिरफ्तारी की निंदा की है, उन्होंने भी यह जरूर कहा है कि पत्रिका को ऐसी तस्वीर नहीं छापनी चाहिए थी। यह बात किसी हद तक सही भी हो सकती है। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर किसी की धार्मिक आस्था पर चोट करना कहीं से भी उचित नहीं है। मगर, इसके आधार पर तो मकबूल फिदा हुसैन की ’नंगी सरस्वती’ का भी विरोध किया जाना चाहिए था। अगर डेनमार्क के कलाकार को अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है, तो हुसैन को किसी की धार्मिक भावनाओं को आहत करने की आजादी कैसे है? हुसैन वहीं रुके नहीं रहे। वे अब भी कुछ न कुछ करते रहते हैं, क्योंकि विवाद पैदा करके बाजार पाना उनका शगल है। परंतु हर बार भारतीय बुद्धिजीवियों का एक बड़ा तबका कलाकार की अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर उनके पक्ष में खड़ा हुआ दिखता है। अब वह तबका चुप क्यों है? वह क्यों दोहरा मानदण्ड अपना रहा है।यह शिकायत सरकार से भी हो सकती है कि उसने आलोक तोमर को तो तिहाड़ में बंद कर दिया था, मगर हुसैन से कभी औपचारिक पूछताछ तक नहीं की। वैसे सरकार तथा उसमें शामिल पार्टियों के लिए धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र का कोई मूल्य नहीं है, सिर्फ सत्ता हथियाने की रणनीति है। हमारे यहां जनतंत्र के नाम पर दो सत्ता गठबंधन बने हुए हैं-एक वह जो हिंदू सांप्रदायिकता का समर्थक है और दूसरा वह जो इसका विरोधी है। जाहिर है दूसरा, हिंदू को छोड़कर अन्य सम्प्रदायों की साम्प्रदायिकता का विरोधी नहीं है, यानी उसने धर्मनिरपेक्षता को एक मूल्य के रूप में स्वीकार नहीं किया है। ऐसे में यह बहुत स्वाभाविक है कि वह गठबंधन अपनी सियासत की जरूरत के मुताबिक हुसैन अथवा तोमर में से किसी एक को गिरफ्तार कर ले और दूसरे की उपेक्षा कर दे। पर जो बुद्धिजीवी लेखक-पत्रकार धर्मनिरपेक्षता और अभिव्यक्ति की आजादी को मूल्य के रूप में अपनाने का दावा करते हैं, वे भी इस मसले पर दुरंगी नीति अपना रहे हैं, तो यह खेद का विषय है।इस खेद के बावजूद हम यह कहना चाहेंगे कि इस समय इस मुद्‌दे पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में खड़ा होना आसान नहीं है। इस्लाम पहले से ही अमेरिका और उसके पश्चिमी मित्रों के निशाने पर है। पश्चिमी देश समय≤ पर ऐसे कुछ कारनामे करते रहते हैं, जिनसे मुस्लिम जगत में उबाल आए और कट्‌टरपंथ की जड़ें गहरी हों। इस बार भी उन्होंने यही किया है। यह मामला किसी कलाकार की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नहीं है, बल्कि मुस्लिम समाज में कट्‌टरपंथ की जड़ें मजबूत करने की साजिश है, जिसका एक बहुत बड़ा आर्थिक कारण है, जो अब किसी से छुपा नहीं है। यही बात हुसैन के लिए भी कही जा सकती है। वे कला की स्वतंत्रता का उपयोग विवाद के माध्यम से बाजार में अपनी कीमत बढ़ाने के लिए करते हैं।इस विडम्बनापूर्ण स्थिति के पीछे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की वह पश्चिमी अवस्था है, जो किसी भी स्तर पर एशियाई समाज के अनुकूल नहीं है। स्वयं पश्चिम भी इस मुद्‌दे पर दोहरा रुख अपनाता है और अपने हितों के मुताबिक इसे स्वीकारता अथवा नकारता रहता है। अब इस पूरी अवधारणा पर ही एक नई बहस शुरू करने की जरूरत है। यूरोप अपने लिए चाहे जो सोचे, एशियाई समाज में हमेशा ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कलाकार की प्रतिबद्धता के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए। रचने की आजादी के नाम पर किसी की धार्मिक, भाषायी, जातीय भावनाओं को आहत करना न केवल अनुचित है, बल्कि कई बार इसके पीछे ऐसी कुत्सित भावना भी होती है, जिसका तीव्र प्रतिवाद किया जाना चाहिए। चाहे हुसैन हों, अथवा डेनमार्क का वह कार्टूनिस्ट- दोनों के उद्‌देश्य गर्हित हैं, इसलिए अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर इनका पक्ष नहीं लिया जा सकता। परंतु, निंदा से बड़ी इनकी कोई सजा भी नहीं हो सकती। आलोक तोमर की भी निंदा की जानी चाहिए थी, गिरफ्तारी नहीं।

कड़वा सच

इष्ट देव सांकृत्यायन
दिल्ली में ताबड़तोड़ हुए धमाको और उनमें कई लोगों की जान जाने के बाद दूसरे दिन जितनी भी बैठके हुईं, सबमें केन्द्रीय गृह मंत्री शिवराज पाटिल अलग-अलग परिधानों में दिखाई दे रहे थे. मीडिया ने इस बात की जबर्दस्त आलोचना की. यह अपेक्षा न करें कि मैं यह कहूंगा कि आलोचना नहीं की जानी चाहिए. कायदे से तो इस बात की कड़ी भर्त्सना की जानी चाहिए. मीडिया ने नहीं की, इसके लिए वह आलोचना की पात्र है.
पर अब इस बात पर पाटिल की सफाई आई है. पाटिल ने कहा है के मैं साफ-सुथरा रहता हूं. आप राजनेता की नीतियों की आलोचना करें, उसके कपड़ों की नहीं। मैं पाटिल को बताना चाहता हूं कि मान्यवर यह आपकी नीतियों की ही निंदा है, कपड़ों की नहीं एक ऐसे समय में जब पूरा देश जल रहा हो और तब आपका ध्यान अगर बार-बार कपड़े बदलने पर लगा हो तो जाहिर है कि देश और जनता से आपका कोई मतलब नहीं है. दुलहन के जोड़े में सजी बैठी लड़की के पड़ोस में भी अगर आग लग जाए तो अपने शृंगार और कपड़ों की परवाह छोड़कर उसे बुझाने की कोशिश में जुटेगी. ऐसी स्थिति में दिन में एक बार भी कपड़े बदल लेना काफी है. और एक ऐसे राजनेता के लिए, जो पूरे देश की सुरक्षा और व्यवस्था के लिए ज़िम्मेदार हो, तो कपड़े पहन लेना ही बहुत है. आपको शायद यह मालूम नहीं है कि देश का गृहमंत्री होने के नाते पूरा देश आपका पड़ोस भी नहीं घर है.
मुझे आप जैसे संवेदनहीन राजनेता से कोई सहानुभूति नहीं रह गई है. लिहाजा मैं यह बेमतलब का औपचारिक वाक्य लिखने की कोई ज़रूरत नहीं समझता कि ईश्वर न करे. सीधा सवाल कर रहा हूं, कि अगर आपके उस घर में आग लगी हो जिसमें आपके अपने बेटे-बहू पोते-पोती रहते हैं, तो क्या आप तीन बार कपड़े बदलने जाएंगे. कपडोँ का कुछ होश भी आपको रहेगा क्या? असल में आपका यह कहना आपकी इस सोच को उजागर करता है कि जो लोग दिन में दस बार कपड़े नहीं बदलते वे गंदे होते हैं.
वाह! हम एक ऐसे आदमी को केन्द्रीय गृह मंत्री के रूप में पिछले क़रीब पांच सालों से झेल रहे हैं, जो शायद उन्हें गंदे लोग या कीड़े-मकोड़े मानता है जो दिन में तीन बार कपड़े नहीं बदल सकते हैं. इनमें चार साल तो हमने उसे अपने संसदीय राजनीति के प्रति आस्थावान वामपंथी भाइयों के सहयोग से झेला है.
पाटिल महाराज से मैं जानना चाहता हूं कि प्रभु एक अरब की आबादी वाले इस देश में ऐसे कितने लोग हैं जो तीन दिन में एक बार भी कपड़े बदल पाने की हैसियत रखते हैं? उनके बारे में जरा आप साफ-साफ बताइए, क्या खयाल रखते हैं? बहरहाल, हम आपकी नीतियों की ही बात करना चाहते हैं. आपकी नीतियां कैसी हैं, यह भी हम अपनी नही, आपकी ही समझ से तय करेंगे। आपकी समझ क्या है, इसे आप स्वयं तय करें.
कहां अफजल गुरू और कहां सरबजीत! एक दोषसिद्ध अपराधी, आपके ही सुप्रीम कोर्ट से और एक भूला-भटका आदमी. एक की भलमनसाहत यह कि उसने संसद हमले की साजिश रची और दूसरे का अपराध सिर्फ इतना कि वह भटक कर सीमा पार कर गया. आज तक पाकिस्तान की अदालतों में भी उस पर कोई दोष कायदे से सिद्ध नहीं हो सका. आप दोनों को एक ही पलड़े पर तौल रहे हैं. वैसे तो कानून के विद्यार्थी रहे हैं. ·कुछ दिनों तक आपने वकालत भी की है. क्या अपने सुप्रीम कोर्ट पर आपका विश्वास नहीं है, या फिर संविधान पर ही....? या कहीं ऐसा तो नहीं कि आपके गृहमंत्री बने रहने की यही शर्त हो.
इस पद के लिए आपकी काबिलीयत जो है वह तो जाहिर हो चुकी है. चुनाव जीतकर आप लोकसभा में तो आए नहीं हैं. बैकडोर से केंद्रीय मंत्री बनाए गए हैं. वह भी प्रधानमंत्री के बाद देश का सबसे महत्वपूर्ण पद. एक ऐसा पद जिसे कभी सरदार वल्लभ भाई पटेल सुशोभित कर चके हैं, अब उस पर आप जाने क्या-क्या कर रहे हैं. यह तो आप जानते ही हैं कि अफजल गुरू ·को फांसी दी जाए या छोड़ा जाए, इसका फैसला राष्टपति को आपके ही मंत्रालय के सुझाव पर करना है. आपका मंत्रालय क्या कर रहा है, यह बात सरबजीत के साथ उसके मिलान से जाहिर हो चुकी है.
आपने सवाल किया है कि आप क्या मुझसे यह उम्मीद करते हैं कि मैं अपने खिलाफ ऐसी आलोचनाओं का जवाब दूंगा. आपने यह फैसला लोगों पर छोड़ दिया है कि वे यह फैसला करें कि किसी राजनेता की आलोचना का यह तरीक़ा सही है या नहीं. और जनाब! मैं भी इस देश के लोगों में से एक हूं. मैं यह फैसला आप पर छोड़ रहा हूं कि आप खुद ही यह तय करें कि आपके गृहमंत्री पद की गरिमा की तो बात ही छोड़ दी जाए, सामान्य नागरिक धर्म के निर्वाह का भी यह तरीक़ा सही है या नहीं?