Friday, October 10, 2008

क्यों चुप है इस्लामी दुनिया

प्रेम शुक्ल

इस समय पूरी दुनिया इस्लामी आतंकवाद से त्रस्त है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या पूरा इस्लामी समुदाय आतंक का पोषक है. क्या इस्लामी दुनिया का बड़ा हिस्सा आतंकवाद का समर्थक है? अगर ऐसा नहीं है तो इस्लामी दुनिया से आतंकवाद के खिलाफ आवाज क्यों नहीं उठती? पूरी दुनिया को साफ-साफ क्यों नहीं बताया जाता कि इस्लामी समुदाय का बहुसंख्यक हिस्सा आतंकवाद का समर्थन करनेवाले बहावी, देवबंदी, अहले हदीस की विचारधारा को नहीं मानता? पेट्रो डालर के बल पर संयुक्त अरब अमीरात और सउदी अरब से प्रचारित होनेवाला और जमीयते इस्लामी, तालिबान, अल-कायदा, सिमी जैसे संगठनों के माध्यम से पूरी दुनिया में आतंक का बारूद बिछानेवालों की कौम इस्लामी दुनिया में अल्पसंख्यक हैं. पेट्रो डालर आज भी इमाम अबू हनीफ के हनफी संप्रदाय की तुलना में काफी छोटा है. हनफी समुदाय मुल्ला उमर और ओसामा बिन लादेन के इस्लाम का समर्थन तो दूर उनसे नफरत करता है और उन्हें मुसलमान मानने को भी तैयार नहीं. पश्चिमी देशों के अलंबरदार इस हकीकत को क्यों नजरअंदाज कर रहे हैं?दरहकीकत मुसलमान तो सभी हैं, मगर इनमें इबादत के तरीके मुख्तलिफ हैं. मोटे तौर पर इस्लामी जगत में शिया और सुन्नी नामक दो फिरके हैं. इन दोनों के बीच चौथे खलीफा हजरत अली के जमाने से इख्तिलाफ चला आ रहा है. एक ही खुदा, एक ही कुरान और एक ही पैगम्बर को मानते हुए दोनों फिरके आपस में रंजिश रखते चले आये हैं. इराक इरान की दुश्मनी शिया और सुन्नी की दुश्मनी का सबसे बड़ा प्रतीक है. इराक के खात्मे और इस्लामी जगत की सियासत में इस्लाम के हाशिये पर चले जाने के बाद से शिया और सुन्नी के बीच वारदात की घटनाएं कम हो गयी हैं. पर आज भी बहुसंख्यक मुसलमान शिया समुदाय से नफरत करता है और उनको अपमानित करने के लिए खटमल जैसे शब्दों का प्रयोग करता है. बहुसंख्यक सुन्नी या हनफी समुदाय के लिए आजकल टीटीएस शब्द का प्रचलन है. टीटीएस का मतलब है- टकाटक सुन्नी. देवबंदी या बहावी चूंकि खुद शुद्ध मुसलमान होने का दावा करते हैं इसलिए उनके लिए '२४ नंबरी' की उपाधि प्रचलित है. यह २४ का आंकड़ा २४ कैरेट सोने से उठाया गया है. चूंकि शियाओं से सुन्नियों का विवाद शतकों पुराना है इसलिए उनकी मस्जिदें भी अलग-अलग होती हैं. अब इस्लामी जगत का असल झगड़ा सुन्नियों के आपस का है. सुन्नियों में ही अब सुन्नियों के बीच एक दूसरे से अलग मस्लक-तरीके प्रचलित हो गये हैं. इनमें बहावी, अहले हदीस, देवबंदी और बरेलवी संप्रदाय हैं.बहावी, अहले हदीस और देवबंदी मूलतः सउदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के सत्ता प्रतिष्ठान से समर्थन पाते हैं. इन सब मस्लकवालों की बरेलवियों से ठनी रहती है. शुरू के दौर में इस्लाम में धर्म की व्याख्या कई इमामों ने की थी. इनमें अबू हनीफ मुख्य थे. उनके बताये तरीकों पर चलनेवाले हनफी कहलाए. बरेली के इमाम अहमद रजा भी हनफी थे. भारतीय उपमहाद्वीप में हनफियों का जोर है. अहले हदीस, देवबंदी और बहावियों का एतराज है कि हनफी बरेलवियों के मुल्ला मौलवियों ने अपनी दुकानदारी चमकाने के लिए जाहिल मुसलमानों को बहका दिया है. परिणामस्वरूप मुसलमान कई खराबियों के शिकार हो गये हैं. उनका आरोप है कि हिन्दुस्तान जैसे मूर्तिपूजक देश के असर से बरेलवी मुसलमान भी कब्रों और मजारों को पूजने लगे हैं. वे भोजन पर मंत्र पढ़ते हैं, नजरों-नियाज दिलाते हैं, मोहर्रम मनाते हैं और पैगम्बर मोहम्मद साहब यानी नबी के जन्मदिन पर बड़े-बड़े जुलूस निकालते हैं. उनका आरोप है कि बरेलवियों ने गैर मुस्लिमों के तौर-तरीके और रस्मो-रिवाज अपना रखे हैं जो कि इस्लाम की रू से नाजायज और हराम है.दरअसल भारत में इस्लाम फारस, अरब, अफगानिस्तान और तुर्किस्तान से आये. फारस, अफगान और तुर्की में हनफी संप्रदाय का व्यापक असर था इसलिए हिन्दुस्तान के इस्लामी सत्ताधीशों ने हनफी संप्रदाय के सूफियों को प्रश्रय दिया. आज भी बरेलवी मुसलमानों की सूफी परंपरा में चिश्तिया, नक्शबंदिया, कादरिया और सुहराबर्दिया सिलसिला प्रचलित है. इनमें चिश्ती सिलसिला देश के छोटे-छोटे गांव में भी मिल जाएगा. भारत में चिश्तिया सिलसिला अजमेर के ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती से शुरू होता है. उनका जन्म ११४२ में अफगानिस्तान में हुआ था. वे ११९२ में मोहम्मद गोरी की सेना के साथ भारत आये थे. ११९५ में वे अजमेर में बस गये. वहीं उन्होंने पर्दा किया (समाधि ली). जहां उन्होंने पर्दा किया उस दरगाह की ख्याति वैश्विक है. यहां जिन चार सूफी संतों का जिक्र है वे सभी इस्लामी हमलावरों के साथ आये थे लेकिन हिन्दुओं के भक्तिमार्ग के साथ समन्वय बनाकर उन्होंने इस्लाम का प्रसार किया. यहां यह भी जान लीजिए कि इस्लामी उलेमाओं का हमेशा इनके साथ मतभेद बना रहा. सिर्फ शरीयत ने सूफी और उलेमा के बीच अंतरसंबंध बनाये रखने का काम किया.लेकिन धीरे-धीरे भारत में सूफी रहस्यवाद को माननेवाले मुख्यधारा बन गये. शेख अहमद सरहिन्दी, शाह वलीउल्लाह, सैयद अहमद बरेलवी, करामत अली, सर सैयद अहमद खान, अल्लामा इकबाल और मौलाना मौदूदी ये सभी हनफी यानी बरेलवी यानी सूफी रहस्यवाद की परंपरा के समर्थक विद्वान हुए. अकबर के आखिरी दिनों में शेख सरहिन्दी ने समकालीन संतों गुरूनानक और संत कबीर के खिलाफ अभियान चलाया था. सरहिन्दी ने हिन्दुओं पर जजिया कर जजिया कर हटाये जाने का विरोध किया और अकबर के व्यापक दृ्ष्टिकोण की निंदा कर अकबर द्वारा भ्रष्ट किये जा रहे इस्लाम के शुद्धिकरण का अभियान भी चलाया था. जब जहांगीर ने सरहिन्दी के तेवर में बगावत देखी तो उसे ग्वालियर में गिरफ्तार करवा दिया. साल भर बाद सरहिन्दी कैद से रिहा किये गये. तब तक सरहिन्दी हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच बैर का बीज बोने में कामयाब हो चुके थे.सरहिन्दी की ही तरह नक्शबंदी समुदाय के दूसरे आलिम शाह वलीउल्लाह ने हिन्दूद्रोही अभियान चलाया. शाह वलीउल्लाह अठारहवीं सदी में मराठों और जाटों के बढ़ते प्रभाव से क्षुब्ध थे. उन्होंने १७५० के दशक में इस्लाम की रक्षा के लिए अफगान शासक अहमद शाह अब्दाली को दिल्ली पर कब्जा करने का निमंत्रण दिया था. सैयद अहमद बरेलवी इन्ही वलीउल्लाह के पुत्र अब्दुल अजीज के मुरीद हुए. सैयद अहमद बरेलवी ने गैर-इस्लामी शासकों के खिलाफ इस्लामी जिहाद शुरू किया. वह बालकोट की लड़ाई में सिख राजा रंजीत सिंह के हाथों मारा गया. सैयद अहमद बरेलवी के मुरीद करामत अली ने इस्लाम को हिन्दू प्रभाव से मुक्त कराने का अभियान आगे बढ़ाया था. करामत अली के इस्लामी दर्शन पर ही वर्तमान अहले हदीस संप्रदाय की नींव पड़ी है. शाह वलीउल्लाह और वहाब की विचारधारा के आधार पर देवबंद की नींव पड़ी. अरब के देश शुद्ध इस्लाम यानी वहाबी, अहले हदीस और देवबंदी फिरकों के पोषक हैं. पिछले दो दशक से यही वर्ग पेट्रो डालर के बल पर पाकिस्तान, भारत और बांग्लादेश में गरीब हनफियों को देवबंदी बनाने में जुटी हुई है. इसी तब्लीग के माध्मय तालिबान की पैदाईश हुई. अगर अठारहवीं सदी में शाह वलीउल्लाह अफगानिस्तान के अहमद शाह अब्दाली को बुलाकर मराठों, जाटों, सिक्खों और चिश्तियों का कत्ल करना चाहते थे तो आज वही काम देवबंद के शरीफ आलिम ओसामा और मुल्ला उमर के लड़ाकों के जरिए करवा रहे हैं. निश्चित रूप से इनसे लड़ने के लिए कौम से ही अबू हनीफा, ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती, निजामुद्दीन चिश्ती, ख्वाजा बकी और बहाउद्दीन जकारिया के मुरीदान को जगाना होगा.

नया मीडिया

बालेन्दु दाधीच
भविष्य का मीडिया सीमा बनाने नहीं, मिटाने के बारे में है। हम इतिहास के उस दौर में हैं, जहां सूचना के केंद्रीकरण या नियंत्रण की मानसिकता ही खतरे में है।ऐसा रुपांतरकारी बदलाव सदी में एकाध बार ही होता है। जनसंचार और जनसूचना की दुनिया में बरसों तक प्रिंट मीडिया का राज चलता रहा। पिछली सदी के आखिरी बरसों में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने उसकी शांति भंग की, लेकिन एक-दूसरे के लिए खतरा बनने की बजाय दोनों साथ-साथ आगे बढ़ने लगे। लेकिन अब मीडिया में जो नई लहर उठी है, वह मीडिया के परंपरागत दायरों को तोड़ती हुई इन फर्कों को मिटा रही है। यह नया मीडिया हमारी दुनिया को जीने और सोचने के अंदाज को, सूचना पाने और बरतने के तरीके को पूरी तरह बदल डालने पर आमादा है। नया मीडिया ऐसा मीडिया है, जिसमें कंटेंट और प्रेजेंटेशन में कंप्यूटर या डिजिटल टेक्नॉलजी की भूमिका रहती है। इंटरनेट के फैलाव के साथ इसका असर बढ़ता चला गया है। मीडिया में तकनीक की दखल से आया यह बदलाव दूरगामी असर डालने वाला है। यह मीडिया की अब तक की अवधारणाओं को भी बदल देता है, क्योंकि यह इंटरेक्टिव है। पाठक या दर्शक के साथ इसका रिश्ता एकदम सीधा है। परंपरागत मीडिया के 'एक प्रकाशक, अनेक पाठक' वाले तानाशाही ढांचे को तोड़कर यह 'अनेक प्रकाशक, अनेक पाठक' के लोकतांत्रिक संसार में ले जाता है। यही बेसिक फर्क है जो मीडिया और इसकी प्रतिक्रिया को पूरी तरह बदल सकता है। मीडिया के लिए यह एक चुनौती है और एक मौका भी। इसके जरिए मीडिया को अपना विस्तार करने, असर पैदा करने, पाठक से जुड़ने और फायदा कमाने का मौका मिला है। भविष्य पर नजर रखने वाला कोई भी संस्थान इस रोमांचक, सीमाहीन और तेज मीडियम से परहेज करके नहीं रह सकता। यह दौड़ शुरू हो चुकी है। प्रिंट और टीवी की कैद से बाहर निकलकर हर अखबार इंटरनेट पर आ रहा है, बीबीसी अपने 12 लाख घंटे के प्रोग्राम वेब पर डालने में जुटा है, सिटिजन रिपोर्टर चलन में आ रहे हैं, लाखों किताबों का डिजिटलाइजेशन किया जा रहा है और बेखौफ कमेंट्स के लिए पाठकों को ब्लॉग का मंच मुहैया किया जा रहा है। सैकड़ों साल का बुजुर्ग मीडिया तकनीक की वियाग्रा से ताकत पाकर अचानक छैल-छबीला बन बैठा है। यह बदलाव का ऐसा दौर है, जिसमें शामिल न होना आत्मघाती हो सकता है। बीबीसी की न्यू मीडिया शाखा के मुखिया एश्ले हाइफील्ड का कहना है कि पांच साल बाद वही मीडिया संस्थान बचेंगे जो तेज होंगे। इसके लिए अभी से तैयार होना होगा। वरना डिजिटल डायनासोर बन जाने का खतरा है। भारतीय संदर्भ में यह बात शायद अतिशयोक्ति लगे, क्योंकि यहां प्रिंट, टीवी और रेडियो, तीनों ही का वैसे ही विस्तार हो रहा है जैसे न्यू मीडिया का। लेकिन अमेरिका और ब्रिटेन में पुराने मीडिया के लिए न्यू मीडिया सचमुच चुनौती बन चुका है। अमेरिकी ऑडिट ब्यूरो के मुताबिक पिछले एक साल में न्यू यॉर्क टाइम्स, वॉशिंगटन पोस्ट, न्यू यॉर्क टाइम्स और न्यूज डे जैसे अखबारों के सर्कुलेशन में पांच पर्सेंट की गिरावट आई है। इसके बरक्स अखबारों की वेबसाइटों पर पाठकों की तादाद छह पर्सेंट बढ़ गई है। क्या यह ओल्ड मीडिया से न्यू मीडिया की ओर शिफ्ट का संकेत है? क्या यह बात भारत पर भी लागू होगी? फौरी तौर पर तो नहीं, क्योंकि मीडिया ट्रेंड्स के मामले में हम पश्चिम से कुछ साल पीछे चल रहे हैं। पश्चिमी देशों में समाज के मूल यानी मोहल्लों तक से अखबार निकल रहे हैं। यह ट्रेंड अब तक भारत नहीं पहुंचा है और वहां इसकी विदाई की भी तैयारी हो गई है। मोबाइल फोन पर थ्री-जी सर्विस की हमारे यहां कब शुरुआत होगी यह अभी साफ नहीं है, जबकि पश्चिम में यह बीते जमाने की बात हो गई है। लेकिन न्यू मीडिया का किस्सा अलग है। वह पश्चिम के साथ-साथ यहां आया है और शुरुआती सुस्ती के बाद उसने रफ्तार पकड़ ली है। भारत में इंटरनेट यूजर्स की तादाद सितम्बर 2006 में 3.22 करोड़ थी, जो एक साल बाद 4.6 करोड़ हो गई। एक साल में 40 पर्सेंट का इजाफा मायने रखता है। इससे अंदाजा लगाइए कि भविष्य में क्या होगा। ऐसे में नये मीडिया को वैकल्पिक मीडिया मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह कोई छोटी-मोटी हलचल भी नहीं है। यह अब तक के मीडिया के सभी प्रकारों से बड़ा, ताकतवर और तकनीक समृद्ध है। उसमें पारंपरिक मीडिया को समा लेने की काबिलियत है। लेकिन यह दुश्मन नहीं है, क्योंकि यह सभी के लिए उपलब्ध है। आप चाहें तो इसे मीडिया का मीडियम कह सकते हैं। यह सूचनाओं को सीमाओं से आजाद कर देता है। यह हमें सत्ता की दखल के पार ले जाता है। यह कई तरह के मीडिया को एक साथ लाता है, बिना उनकी पहचान गंवाए और उन्हें पहले से ज्यादा असरदार बना देता है। एक ही वेब पेज पर खबर, उससे जुड़े विडियो, फोटो, पिछली खबर के लिंक, बैकग्राउंड, कमेंट्स और बहस, यह काबिलियत पुराने मीडिया में नहीं थी। वह सूचना के अनुभव को इकहरे रूप में पेश करता था। एक खुला और काफी हद तक नियंत्रण मुक्त मीडिया होने के नाते इसके कंटेंट, क्वॉलिटी और साख को लेकर कुछ सीमाएं हैं। ये सीमाएं अतिरिक्त जागरूकता की मांग करती हैं। लेकिन इसका फैलाव इतना ज्यादा है कि इसके जादू से बचा नहीं जा सकता। यह ई-मेल से लेकर सर्च इंजन, सॉफ्टवेयर डाउनलोड, वीडियो साइट, न्यूज, ई-कॉमर्स, फोटो शेयरिंग, चैट, कम्युनिटी और ब्लॉग तक फैला है। इसका दायरा खबर से ज्यादा व्यापक है। ब्रिटेन में नये मीडिया के ताजा सर्वे के मुताबिक टॉप बीस में से सिर्फ सात वेबसाइटें ही खबरों से जुड़ी हैं। भविष्य का मीडिया सीमाओं के बारे में नहीं, सीमाएं मिटाने के बारे में है। हम इतिहास के उस दौर में हैं, जहां सूचना के केंद्रीकरण या नियंत्रण की मानसिकता ही खतरे में है। शेन बोमैन और क्रिस विलिस के शब्दों में कहें तो खबरों के चौकीदार के रूप में पारंपरिक मीडिया के रोल को सिर्फ तकनीक से ही नहीं, अपने उपयोगकर्ता से भी खतरा है। न्यू मीडिया का सबसे बड़ा योगदान ही शायद यह है कि उसने उपभोक्ता को उत्पादक बना दिया है। यह पहला मीडिया है, जिसमें सूचना हर तरह की मोनोपली से आजाद हो जाएगी। इससे लोकतंत्र को अपने सच्चे रूप में सामने आने में मदद मिलेगी। जाहिर है, नया मीडिया नये संसार का दरवाजा खोल रहा है।

अखबारों की बदलती प्राथमिकता

अंबरीश कुमार
भूख, भुखमरी और कर्ज में डूबे किसानों का सवाल हो या फिर जल, जंगल, जमीन के मुद्दे, अखबारों में इनकी जगह कम होती जा रही है। अस्सी के दशक में जब हमने पत्रकारिता शुरू की थी तो उस समय समाज के बारे में, जन आंदोलनों के बारे में लिखने का रूझान था। आपातकाल के बाद छात्र आंदोलन खासकर जयप्रकाश आंदोलन से जुड़े नौजवानों का एक वर्ग पत्रकारिता में भी आया। इसका सकारात्मक असर भी दिखा। अस्सी के दशक में ही हिन्दी पत्रकारिता की याचक व सुदामा वाली दयनीय छवि को पहले रविवार ने तोड़ा फिर जनसत्ता के उदय ने इसे पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। उससे पहले हिन्दी पत्रकार का वह रूतबा नहीं होता था जो अंग्रेजी के पत्रकार का होता था। सन १९८४ के दंगों में सिखों के कत्लेआम की खबरें जनसत्ता ने जिस अंदाज में दीं, उसने इस अखबार को नई ऊंचाई पर पहुंचाया। इसके बाद के राजनैतिक घटनाक्रम और मीडिया कवरेज में हिन्दी मीडिया की भूमिका बदली। उस समय तक दिल्ली की पत्रकारिता में अंग्रेजी का वर्चस्व था।इसी दौर में राजनैतिक घटनाओं की कवरेज हिन्दी मीडिया ने अंग्रेजी मीडिया से लोहा भी लिया। उस दौर में प्रसार संख्या का वह दबदबा नहीं था जो आज है। यह भूमंडलीकरण के पहले के दौर की बात है। तब किसी अखबार में प्रबंधक यह नहीं समझ सकता था कि कैसी खबरें लिखी जाएं? पर नब्बे के दशक के बाद हालात तेजी से बदले। पहले मंडल फिर कमंडल ने मीडिया को भी विभाजित कर दिया। सन १९९२ में बाबरी मस्जिद ध्वंस के साथ ही सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ाने वाली खबरें थीं तो दूसरी तरफ सांप्रदायिकता का मुकाबला करने वाले पत्रकार थे। उत्तर प्रदेश में कुछ अखबारों की प्रसार संख्या उसी दौर में तेजी से बढ़ी भी। इसके बाद उदारीकरण का नया दौर शुरू हुआ और सामाजिक सरोकार से जुड़ी खबरें हाशिए पर जने लगीं। नब्बे के दशक के बाद से ही संपादक नाम की संस्था खत्म होने लगी। प्रबंधन तंत्र में मार्केटिंग विभाग का दबदबा बढ़ने लगा। अब प्रबंधन संपादकों को प्रसार और विज्ञापन बढ़ाने के नए तौर-तरीकों पर फोकस करने का दबाब डालने लगा। उसी दौर में हमारे नए संपादक ने बैठक कर सवाल किया कि हमारे अखबार की यूएसपी क्या है? यूएसपी जैसा शब्द सुनकर संपादकीय विभाग के पुराने लोग कुछ समझ नहीं पाए। तब बताया गया कि इस शब्द के मायने यूनिक सेलिंग प्वाइंट यानी अखबार को बेचने की खासियत क्या होगी? उसके बाद राजनैतिक और सामाजिक सवालों को किनारे कर प्रसार और विज्ञापन बढ़ाने वाले कवरेज पर ध्यान देना शुरू किया गया। मसलन, दिल्ली के बाजार में सबसे ज्यादा चाट बेचने वाले व्यवसायी के बारे में क्यों न लिखा जए। इसके बाद सनसनीखेज खबरों और समाज के अभिजात्य वर्गीय लोगों के बारे में कवरेज पर जोर दिया जाने लगा। उसी दौर से पेज-थ्री की नई परिकल्पना शुरू हो गई जो आज और समृद्ध हो चुकी है। पहले अंग्रेजी मीडिया ने इसे ज्यादा तबज्जो दी पर धीरे-धीरे हिन्दी में भी इसने पैर जमा लिए। इस बीच हिन्दी और भाषाई मीडिया ने प्रसार के मामले में अंग्रेजी अखबारों को पीछे ढकेल दिया। जनकारी के मुताबिक-हिन्दी मीडिया में दैनिक जगरण, भास्कर, अमर उजला और हिन्दुस्तान अंग्रेजी अखबारों से काफी आगे निकल गए। दैनिक जगरण ५३६ लाख, भास्कर ३0६ लाख, अमर उजला २८२ लाख पाठकों के साथ अंग्रेजी दैनिक टाइम्स ऑफ इंडिया के १३५ लाख पाठकों के मुकाबले काफी आगे जा चुके हैं। जबकि क्षेत्रीय अखबार भी अंग्रेजी अखबारों को पीछे छोड़ चुके हैं। तमिल अखबार डेली थांती २0९ लाख पाठकों के साथ सबसे ऊपर आ चुका है। उसके बाद मराठी अखबार लोकमत २0७ लाख पाठकों के साथ दूसरे नंबर पर जा पहुंचा जबकि बंगाल का आनंद बाजर पत्रिका १५८ लाख, तेलगू का इनाडु १४२ लाख पाठकों के साथ अंग्रेजी अखबारों से आगे हैं। एकल संस्करण के मामले में बंगाल का आनंद बाजार पत्रिका १२,३४,१२२ प्रसार संख्या के साथ पहले नंबर पर है जबकि दूसरे नंबर पर द हिन्दू ११,६८,0४२ पाठकों के साथ है।बढ़ती प्रसार संख्या के बावजूद इन अखबारों में सामाजिक सरोकार घटता जा रहा है। अंग्रेजी अखबार अभिजात्य वर्गीय समाज पर ज्यादा फोकस कर रहे हैं। हिन्दी मीडिया भी इसी रास्ते पर है। सामाजिक सरोकार के मामले में भी अंग्रेजी मीडिया ने जो रास्ता अपनाया, हिन्दी उसी राह पर चलती दिख रही है। विदर्भ की बात छोड़ दें तो उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड की दशा कहीं ज्यादा खराब है। बुंदेलखंड में पिछले छह साल से सूखा है और कर्ज में डूबे किसानों की खुदकुशी का सिलसिला रूक नहीं रहा है। पर ज्यादातर हिन्दी या अंग्रेजी अखबारों ने अपने संवाददाताओं को बुंदेलखंड का दौरा करने नहीं भेज। राहुल गांधी जब बुंदेलखंड गए तो जरूर कुछ वरिष्ठ पत्रकार वहां पहुंचे। इन अखबारों में देश में सबसे ज्यादा बिकने का ढिढोरा पीटने वाले अखबार हैं तो आजादी के आंदोलन से निकले अखबार समूह भी हैं। संपादक को छोड़ भी दें तो अखबारों के ब्यूरो चीफ, विशेष संवाददाता और राजनैतिक संपादकों ने भी ऐसे इलाकों में जाने की जहमत नहीं उठाई। यह अखबारों की बदलती प्राथमिकता का नया पहलू है।बुंदेलखंड में पानी के लिए जंग शुरू हो चुकी है। कई जिलों में आए दिन मारपीट और हंगामे हो रहे हैं। बरसाती नदियां तो पहले ही सूख गईं। तेज प्रवाह वाली बेतवा से लेकर केन नदी तक की धार कमजोर हो गई है। सूखे और पानी के संकट के चलते ३५ लाख से ज्यादा लोगों का पलायन हो चुका है लेकिन लखनऊ के अखबारों में पहले पेज पर आईपीएल मैच की रंगीन फोटो व खबरें छपती हैं। भूमंडलीकरण और उदारीकरण के दौर में मालिक से लेकर संपादक तक सभी की प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं। यही वजह है कि पत्रकारिता में आने वाले नए लोगों के लिए भी समाज खासकर गांव का समाज कोई मायने नहीं रखता है। वे सरकार के विभिन्न विभागों की कवरेज करते हैं, नेताओं की प्रेस कांफ्रेंस कवर करते हैं या फिर पांच सितारा होटलों में चमचमाते सितारों की खबर लाते हैं। आज अखबार के लिए खबर से ज्यादा महत्वपूर्ण पैसा है, जो खबर पैसा लाने में मददगार हो, वही खबर बन रही है। सामाजिक सरोकार के संदर्भ में ऐसी ही स्थिति जल, जंगल और जमीन की है। कृषि का रकबा कम हो रहा है और जंगल कट रहे हैं। वन्य जीवों का सफाया हो रहा है। सरिस्का की राह पर उत्तर प्रदेश का दुधवा राष्ट्रीय उद्यान भी जा रहा है। अचानक किसी दिन खबर आएगी कि अब दुधवा में बाघ नहीं रहे लेकिन इस बारे में समय रहते खबर नहीं बनती। जिला के स्तर पर माफिया, पुलिस और अफसर के गठजोड़ में जाने अंजाने पत्रकार भी होता जा रहा है। यही वजह है कि न तो सामाजिक सरोकार की खबरें आती हैं और न ही जन आंदोलनों की। हम राष्ट्रीय अखबारों की बात कर रहे हैं। ढाई कोस पर बोली बदलती थी पर अब तो ढाई कोस पर अखबारों के संस्करण भी बदल जाते हैं। राष्ट्रीय अखबारों के अब जिले के संस्करण निकलने लगे हैं जो जिलों के लोगों का दायरा जिले से बाहर जाने नहीं देते। उदाहरण के लिए गोरखपुर के पाठक को फैजबाद जिले तक की जनकारी अखबारों में नहीं मिलती। दूसरे छोटे-छोटे राजनैतिक दलों खासकर वामपंथी दलों के बारे में मीडिया की भूमिका और रोचक है। एक अंग्रेजी अखबार के संपादक ने मेरे सामने ही सीपीआई एमएल के आंदोलन की खबर लेकर आए एक संवाददाता से पूछा-इनकी फालोइंग कितनी है, संवाददाता का जबाब था-ज्यादा नहीं है, सर। इस पर संपादक महोदय ने खबर फेंकते हुए कहा-फिर क्यों जगह खराब कर रहे हो? मीडिया में पहले दो वर्ग थे. आज तीन हो गए हैं.रेल सेवा के तीसरे, दूसरे और पहली श्रेणी की तरह. इनमें पहला भाषाई प्रिंट मीडिया है, दूसरा अंग्रेजी का प्रिंट मीडिया है और तीसरा अभिजात्य वर्ग है इलेक्ट्रानिक मीडिया.वेतन-भत्तो और सुख-सुविधाओं के लिहाज से यह तीसरा वर्ग सब पर भारी है। दूसरे इसका नजरिया भी अन्य वर्गो के प्रति हिकारत वाला है। हालांकि इलेक्ट्रानिक मीडिया में गए सभी लोग प्रिंट के कभी दूसरे या तीसरे दर्जे के पत्रकार होते थे। पर आज वेतन और चैनल की चमक-दमक के चलते ये अपने आप को सबसे अलग मानते हैं। यह बात अलग है कि आज भी खबरों के नाम पर नब्बे फीसदी प्रिंट मीडिया का फालोअप ही उनके पास होता है। अपवाद एक दो चैनल हैं पर सामाजिक सरोकार की बात करें तो इलेक्ट्रानिक मीडिया का हाल प्रिंट से ज्यादा बदहाल है। यह तो पूरी तरह बाजार की ताकतों से संचालित होता है।