प्रेम शुक्ल
इस समय पूरी दुनिया इस्लामी आतंकवाद से त्रस्त है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या पूरा इस्लामी समुदाय आतंक का पोषक है. क्या इस्लामी दुनिया का बड़ा हिस्सा आतंकवाद का समर्थक है? अगर ऐसा नहीं है तो इस्लामी दुनिया से आतंकवाद के खिलाफ आवाज क्यों नहीं उठती? पूरी दुनिया को साफ-साफ क्यों नहीं बताया जाता कि इस्लामी समुदाय का बहुसंख्यक हिस्सा आतंकवाद का समर्थन करनेवाले बहावी, देवबंदी, अहले हदीस की विचारधारा को नहीं मानता? पेट्रो डालर के बल पर संयुक्त अरब अमीरात और सउदी अरब से प्रचारित होनेवाला और जमीयते इस्लामी, तालिबान, अल-कायदा, सिमी जैसे संगठनों के माध्यम से पूरी दुनिया में आतंक का बारूद बिछानेवालों की कौम इस्लामी दुनिया में अल्पसंख्यक हैं. पेट्रो डालर आज भी इमाम अबू हनीफ के हनफी संप्रदाय की तुलना में काफी छोटा है. हनफी समुदाय मुल्ला उमर और ओसामा बिन लादेन के इस्लाम का समर्थन तो दूर उनसे नफरत करता है और उन्हें मुसलमान मानने को भी तैयार नहीं. पश्चिमी देशों के अलंबरदार इस हकीकत को क्यों नजरअंदाज कर रहे हैं?दरहकीकत मुसलमान तो सभी हैं, मगर इनमें इबादत के तरीके मुख्तलिफ हैं. मोटे तौर पर इस्लामी जगत में शिया और सुन्नी नामक दो फिरके हैं. इन दोनों के बीच चौथे खलीफा हजरत अली के जमाने से इख्तिलाफ चला आ रहा है. एक ही खुदा, एक ही कुरान और एक ही पैगम्बर को मानते हुए दोनों फिरके आपस में रंजिश रखते चले आये हैं. इराक इरान की दुश्मनी शिया और सुन्नी की दुश्मनी का सबसे बड़ा प्रतीक है. इराक के खात्मे और इस्लामी जगत की सियासत में इस्लाम के हाशिये पर चले जाने के बाद से शिया और सुन्नी के बीच वारदात की घटनाएं कम हो गयी हैं. पर आज भी बहुसंख्यक मुसलमान शिया समुदाय से नफरत करता है और उनको अपमानित करने के लिए खटमल जैसे शब्दों का प्रयोग करता है. बहुसंख्यक सुन्नी या हनफी समुदाय के लिए आजकल टीटीएस शब्द का प्रचलन है. टीटीएस का मतलब है- टकाटक सुन्नी. देवबंदी या बहावी चूंकि खुद शुद्ध मुसलमान होने का दावा करते हैं इसलिए उनके लिए '२४ नंबरी' की उपाधि प्रचलित है. यह २४ का आंकड़ा २४ कैरेट सोने से उठाया गया है. चूंकि शियाओं से सुन्नियों का विवाद शतकों पुराना है इसलिए उनकी मस्जिदें भी अलग-अलग होती हैं. अब इस्लामी जगत का असल झगड़ा सुन्नियों के आपस का है. सुन्नियों में ही अब सुन्नियों के बीच एक दूसरे से अलग मस्लक-तरीके प्रचलित हो गये हैं. इनमें बहावी, अहले हदीस, देवबंदी और बरेलवी संप्रदाय हैं.बहावी, अहले हदीस और देवबंदी मूलतः सउदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के सत्ता प्रतिष्ठान से समर्थन पाते हैं. इन सब मस्लकवालों की बरेलवियों से ठनी रहती है. शुरू के दौर में इस्लाम में धर्म की व्याख्या कई इमामों ने की थी. इनमें अबू हनीफ मुख्य थे. उनके बताये तरीकों पर चलनेवाले हनफी कहलाए. बरेली के इमाम अहमद रजा भी हनफी थे. भारतीय उपमहाद्वीप में हनफियों का जोर है. अहले हदीस, देवबंदी और बहावियों का एतराज है कि हनफी बरेलवियों के मुल्ला मौलवियों ने अपनी दुकानदारी चमकाने के लिए जाहिल मुसलमानों को बहका दिया है. परिणामस्वरूप मुसलमान कई खराबियों के शिकार हो गये हैं. उनका आरोप है कि हिन्दुस्तान जैसे मूर्तिपूजक देश के असर से बरेलवी मुसलमान भी कब्रों और मजारों को पूजने लगे हैं. वे भोजन पर मंत्र पढ़ते हैं, नजरों-नियाज दिलाते हैं, मोहर्रम मनाते हैं और पैगम्बर मोहम्मद साहब यानी नबी के जन्मदिन पर बड़े-बड़े जुलूस निकालते हैं. उनका आरोप है कि बरेलवियों ने गैर मुस्लिमों के तौर-तरीके और रस्मो-रिवाज अपना रखे हैं जो कि इस्लाम की रू से नाजायज और हराम है.दरअसल भारत में इस्लाम फारस, अरब, अफगानिस्तान और तुर्किस्तान से आये. फारस, अफगान और तुर्की में हनफी संप्रदाय का व्यापक असर था इसलिए हिन्दुस्तान के इस्लामी सत्ताधीशों ने हनफी संप्रदाय के सूफियों को प्रश्रय दिया. आज भी बरेलवी मुसलमानों की सूफी परंपरा में चिश्तिया, नक्शबंदिया, कादरिया और सुहराबर्दिया सिलसिला प्रचलित है. इनमें चिश्ती सिलसिला देश के छोटे-छोटे गांव में भी मिल जाएगा. भारत में चिश्तिया सिलसिला अजमेर के ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती से शुरू होता है. उनका जन्म ११४२ में अफगानिस्तान में हुआ था. वे ११९२ में मोहम्मद गोरी की सेना के साथ भारत आये थे. ११९५ में वे अजमेर में बस गये. वहीं उन्होंने पर्दा किया (समाधि ली). जहां उन्होंने पर्दा किया उस दरगाह की ख्याति वैश्विक है. यहां जिन चार सूफी संतों का जिक्र है वे सभी इस्लामी हमलावरों के साथ आये थे लेकिन हिन्दुओं के भक्तिमार्ग के साथ समन्वय बनाकर उन्होंने इस्लाम का प्रसार किया. यहां यह भी जान लीजिए कि इस्लामी उलेमाओं का हमेशा इनके साथ मतभेद बना रहा. सिर्फ शरीयत ने सूफी और उलेमा के बीच अंतरसंबंध बनाये रखने का काम किया.लेकिन धीरे-धीरे भारत में सूफी रहस्यवाद को माननेवाले मुख्यधारा बन गये. शेख अहमद सरहिन्दी, शाह वलीउल्लाह, सैयद अहमद बरेलवी, करामत अली, सर सैयद अहमद खान, अल्लामा इकबाल और मौलाना मौदूदी ये सभी हनफी यानी बरेलवी यानी सूफी रहस्यवाद की परंपरा के समर्थक विद्वान हुए. अकबर के आखिरी दिनों में शेख सरहिन्दी ने समकालीन संतों गुरूनानक और संत कबीर के खिलाफ अभियान चलाया था. सरहिन्दी ने हिन्दुओं पर जजिया कर जजिया कर हटाये जाने का विरोध किया और अकबर के व्यापक दृ्ष्टिकोण की निंदा कर अकबर द्वारा भ्रष्ट किये जा रहे इस्लाम के शुद्धिकरण का अभियान भी चलाया था. जब जहांगीर ने सरहिन्दी के तेवर में बगावत देखी तो उसे ग्वालियर में गिरफ्तार करवा दिया. साल भर बाद सरहिन्दी कैद से रिहा किये गये. तब तक सरहिन्दी हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच बैर का बीज बोने में कामयाब हो चुके थे.सरहिन्दी की ही तरह नक्शबंदी समुदाय के दूसरे आलिम शाह वलीउल्लाह ने हिन्दूद्रोही अभियान चलाया. शाह वलीउल्लाह अठारहवीं सदी में मराठों और जाटों के बढ़ते प्रभाव से क्षुब्ध थे. उन्होंने १७५० के दशक में इस्लाम की रक्षा के लिए अफगान शासक अहमद शाह अब्दाली को दिल्ली पर कब्जा करने का निमंत्रण दिया था. सैयद अहमद बरेलवी इन्ही वलीउल्लाह के पुत्र अब्दुल अजीज के मुरीद हुए. सैयद अहमद बरेलवी ने गैर-इस्लामी शासकों के खिलाफ इस्लामी जिहाद शुरू किया. वह बालकोट की लड़ाई में सिख राजा रंजीत सिंह के हाथों मारा गया. सैयद अहमद बरेलवी के मुरीद करामत अली ने इस्लाम को हिन्दू प्रभाव से मुक्त कराने का अभियान आगे बढ़ाया था. करामत अली के इस्लामी दर्शन पर ही वर्तमान अहले हदीस संप्रदाय की नींव पड़ी है. शाह वलीउल्लाह और वहाब की विचारधारा के आधार पर देवबंद की नींव पड़ी. अरब के देश शुद्ध इस्लाम यानी वहाबी, अहले हदीस और देवबंदी फिरकों के पोषक हैं. पिछले दो दशक से यही वर्ग पेट्रो डालर के बल पर पाकिस्तान, भारत और बांग्लादेश में गरीब हनफियों को देवबंदी बनाने में जुटी हुई है. इसी तब्लीग के माध्मय तालिबान की पैदाईश हुई. अगर अठारहवीं सदी में शाह वलीउल्लाह अफगानिस्तान के अहमद शाह अब्दाली को बुलाकर मराठों, जाटों, सिक्खों और चिश्तियों का कत्ल करना चाहते थे तो आज वही काम देवबंद के शरीफ आलिम ओसामा और मुल्ला उमर के लड़ाकों के जरिए करवा रहे हैं. निश्चित रूप से इनसे लड़ने के लिए कौम से ही अबू हनीफा, ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती, निजामुद्दीन चिश्ती, ख्वाजा बकी और बहाउद्दीन जकारिया के मुरीदान को जगाना होगा.