पिछले दिनों हुई वीएस वाजपेई की मौत के सदमे से उबर नहीं पाया की आज सुशील त्रिपाठी के मरने की ख़बर ने आहट कर दिया। ये दोनों दिवंगत आत्माएं अपने आप में अद्वितीय थी।
मैं गोरखपुर के एक छोटे से गाँव का रहने वाला हूँ. १९८३ मैं घर से भाग के लखनऊ आया और पत्रकार बन गया. पलायन का यह सिलसिला जो गोरखपुर से शुरू हुआ लखनऊ, दिल्ली, जयपुर, अलवर, दौसा, पटना, धनबाद, भागलपुर होते फ़िर से नोएडा तक पहुँच चुका है. किंचित विश्राम और पुनः नया आयाम.
वैसे तो किसी चीज को समझने के लिए पूरा जीवन कम होता है, फ़िर भी पत्रकारिता को समझने के लिए एक पारी की शुरुआत की है. इसके बदलते आयाम, उतराव-चढाव को करीब से देखा. पत्रकारिता की "खास" चीजों को समझा. बदलते ज़माने के साथ बदलती "पत्रकारीय तस्वीर" को फ़िर से समझने की कोशिश कर इस ज़माने में कदम रखा है........!
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